जिलाधिकारी के.के. नायर: जिन्होंने नेहरू के आदेश के विरुद्ध मूर्तियाँ हटाने से इंकार किया
जब नेहरू ने दुबारा मूर्तियाँ हटाने को कहा, तो फैजाबाद के जिलाधिकारी के.के. नायर ने सरकार को लिखा मूर्तियाँ हटाने से पहले मुझे हटाया जाए।
केरल के अलप्पी के रहने वाले के.के.के. नायर 1930 बैच के आई सी एस अफसर थे। फैजाबाद के जिलाधिकारी रहते इन्हीं के कार्यकाल में बाबरी ढाँचे में मूर्तियाँ रखी गईं या यों कहें, इन्होंने रखवाई थीं। बाबरी मामले से जुड़े आधुनिक भारत के वे ऐसे शख्स हैं, जिनके कार्यकाल में इस मामले में सबसे बड़ा ‘टर्निंग पाइंट’ आय और देश के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर इसका दूरगामी असर पड़ा।
मद्रास यूनिवर्सिटी से पढ़े-लिखे नायर तमिल, मलयाली, हिंदू, उर्दू, अंग्रेजी सहित फ्रेंच, जर्मन, रसियन, स्पेनिस आदि भाषाओं के जानकर थे। नायर 1 जून, 1949 को फैजाबाद के कलेक्टर बने। 23 दिसंबर, 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियाँ मस्जिद में स्थापित हुईं तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से फौरन मूर्तियाँ हटवाने को कहा। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी मूर्तियाँ हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट के.के.के. नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। साथ ही परिसर में ताला बंद कर मुसलमानों काे वहाँ जाने से रोक दिया।
जब नेहरू ने दुबारा मूर्तियाँ हटाने को कहा, तो के.के.के. नायर ने सरकार को लिखा मूर्तियाँ हटाने से पहले मुझे हटाया जाए। देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए सरकार पीछे हट गई। डीएम के.के.के. नायर ने 1952 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।
चौथी लोकसभा के लिए वे उत्तर प्रदेश की बहराइच सीट से जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुँचे। इस इलाके में नायर हिंदुत्व के इतने बड़े प्रतीक बन गए थे कि उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी कैंसरगंज से तीन बार जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुँचीं। उनका ड्राइवर भी उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य बना।
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