अंबेडकर नहीं संत रविदास | आज के भ्रमित हरिजनों हेतु
॥ आज के भ्रमित हरिजनों हेतु ॥
अंबेडकर नहीं संत रविदास
जब संत रामानंद जी के शिष्य संत रविदास का चमत्कार बढ़ने लगा तो इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकंदरसाह लोदी ने सदन कसाई को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जनता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार कर लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं सदन कसाई शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सके और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर उनका भक्त यानी वैष्णव (हिन्दू) हो गया उसका नाम सदन कसाई से रामदास हो गया।
दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी ने क्रोधित होकर इनके अनुयायियों को चमार यानी चंडाल घोषित कर दिया (तब से इस समाज के लोग अपने को चमार कहने लगे) उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया ….
उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए गए लेकिन उन्होंने कहा-
”वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे पढ़ लू झूठ कु*रान.
वेद धर्म छोडू नहीं कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार”.
(रैदास रामायण)
यातनाये सहने के पश्चात् भी वे अपने वैदिक धर्म पर अडिग रहे, और अपने अनुयायियों को बिधर्मी होने से बचा लिया, ऐसे थे हमारे महान संत रविदास जिन्होंने धर्म, देश रक्षार्थ सारा जीवन लगा दिया इनकी मृत्यु चैत्र शुक्ल चतुर्दसी विक्रम सम्बत १५८४ रविवार के दिन चित्तौड़ में हुई।
॥ अंबेडकर नहीं संत रविदास ॥
अंबेडकर का बौद्ध मत दरअसल बुद्ध के दर्शन से बहुत दूर हिंदुत्व का एक विरोध पंथ है। यह विचार समाज को हिंदू धर्म के पाले से बाहर खींचने का काम करती है ऐसे लोग ईसाईयत का अच्छा भोजन होते हैं।
अंबेडकरवादी दरअसल एक कुंठित विचारधारा है जो हिंदुत्व के विरोध को ही अपना आध्यात्म मानकर मुक्ति तलाशती है । जो हास्यास्पद है।
यह ऐसा ही है कि “राम-राम” कहना मूर्खता है पर “मरा-मरा” कह कर मुक्ति मिलेगी।
