उत्तराखंड के प्रान्त प्रचारक डॉ. शैलेन्द्र जी से लोक कलाओं के संरक्षण पर समग्र चर्चा
उत्तराखंड के प्रान्त प्रचारक डॉ. शैलेन्द्र जी से लोक कलाओं के संरक्षण पर समग्र चर्चा
अत्यंत विनम्र एवं सुशील डॉ शैलेन्द्र जी IIT रुड़की से एमटेक व पीएचडी हैं। हरिद्वार में उनके साथ मूल्यवान समय व्यतीत करने का अवसर प्राप्त हुआ एवं उनके साथ चर्चा में मेरे द्वारा सुझाये गए कुछ सार अंश दे रहा हूँ जो पढना सार्थक है।
उत्तराखंड में काष्ठ-प्रस्तर शिल्प तथा वाद्य कलाएं:
उत्तराखंड में काष्ठ-प्रस्तर शिल्प तथा वाद्य यंत्रों के कलाओं के संरक्षण के लिए उनके आर्थिक समावेशन और आधुनिक साज-सज्जा, समारोह आदि में उनकी प्रासंगिकता बढ़ाने से ही उन्हें नया जीवन मिल सकेगा। सरकारी संरक्षण से निश्चित रूप से सहयोग मिलता है, लेकिन इसके बल पर ये कलाएं आत्मनिर्भर नहीं बन सकतीं। सरकारों के बदलने में भी सहयोग आदि प्रभावित होता है। अतः इनके विकास और संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर विचार करने और उन्हें व्यावसायिक रूप से समावेशन करते हुए सशक्त बनाने की आवश्यकता है, जिससे वे समाज और बाज़ार के आर्थिक ताने-बाने में एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकें।
व्यावसायिक समावेशन:
इसके लिए यह जरूरी है कि क्षेत्रीय आर्किटेक्ट्स, इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां और आम लोग इन कलाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी आधुनिक डिजाइन, आयोजन और मनोरंजन के तत्वों और कार्यक्रमों में सम्मिलित करें। ऐसा करने से इन कलाओं की प्रासंगिकता बढ़ेगी और वे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा बन सकेंगी।
क्षेत्रीय स्तर पर सामुदायिक रूप से मिलकर ऐसे काष्ठ-प्रस्तर शिल्प तथा वाद्य यंत्रों के लिए वेबसाइट/ पोर्टल बनाकर उनके निर्माताओं और कलाकारों को लिस्ट कर बाज़ार में यह सेवायें उपलब्ध कराने का एक मंच उपलब्ध हो तो सकारात्मक परिवर्तन आएगा।
इस दिशा में विचारशील नीतियों, बाजार की मांगों के अनुसार उत्पादों की प्रस्तुति, शिल्पियों की आधुनिक तकनीक और डिज़ाइन में दक्षता को बढ़ावा देना, और कला के प्रति लोगों की रुचि जागृत करना जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। इन प्रयासों से ही काष्ठ एवं प्रस्तर शिल्प और वाद्य कलाओं का दीर्घकालिक संरक्षण और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित होगी।
बहुत लोगों से मिलना होता है, परन्तु शैलेन्द्र जी की विनम्रता उन्हें मूल्यवान बनाती है। आपने सिद्ध किया की विद्या से विनय की प्राप्ति होती है।
– शिवेश प्रताप
