मूर्ख भारतीयों के लिए क्रिसमस के मायने…
मूर्ख भारतीयों, पूरी दुनिया के इसाई भी एक मत नहीं हैं की क्रिसमस 25 दिसंबर को होता है | यह तो सिर्फ ब्रिटेन और उनके उपनिवेशों में मनाया जाने लगा |
जूलियन कलेंडर से पश्चिम के चर्च क्रिसमस 7 जनवरी को मानते हैं|
पूरा अमेरिका क्रिसमस 6 जनवरी को मनाता है और शेष लैटिन अमेरिका 19 जनवरी को मनाता है|
क्रिसमस क्यों मनाते हैं ? इसे नेटिविटी ऑफ़ क्राइस्ट या बैपटिज्म आफ लार्ड भी कहते हैं |
ईसामसीह को बप्तिस्मा (baptism) ही क्रिसमस त्यौहार है |यानी हम धर्मान्तरण के पर्व पर प्रसन्नता जाहिर कर रहे हैं |
यहाँ हिन्दू तो जन्म से ही अपने पालनहार विष्णु का पुत्र हो जाता है | हमें बप्तिस्मा की जरुरत नहीं |
|| भारत का क्रिसमस ||
मित्रों आज क्रिसमस है गहराई से इसाई धर्मान्तरण की जाल बिछाने का अवसर | ईसाइयत के त्यौहार हमें अतिवाद और आजादी का एहसास दिलाते हैं जो शुरू में हमें बहोत अच्छे लगते हैं लेकिन यह अँधेरे की ओर खीचने का कुचक्र है | क्रिसमस, १ जनवरी और १४ फरवरी भारत के कामुकतावादी और मानसिक गुलामों द्वारा सेक्स को सेलिब्रेट करने का, दारु पीने का, शील भंग करने का और वर्जनाओं के उस पार जाने का एक रास्ता हो गया है |
एक इंच की ब्रा स्ट्रिप पर टगी हुई नारी की मर्यादा स्वयं ही नग्नता को व्याकुल हो रही है
छोटे शहरों में लोगों को भले ही इस कुचक्र का अंदाजा न हो और खुलापन देखने को न मिले और लोग स्वयं को थोड़ा सा आधुनिकतावादी मानकर हैप्पी या मेरी क्रिसमस बोलें पर मै तो उस समाज में हूँ जहाँ आज नाईट क्लब के दाम ५ से १० गुना हो गए हैं | महँगी शराब की चुस्कियों से पूरा बार थर्रा रहा है | बची खुची गरिमा और एक इंच की ब्रा स्ट्रिप पर टगी हुई नारी की मर्यादा स्वयं ही नग्नता को व्याकुल हो रही है |
पुरुष का पुरुषार्थ ड्रग्स, वोडका और गिन के नशे में घुल रहा है और ह्रदय को कम्पित और दिमाग को सुन्न करने वाला म्यूजिक अब बस कुछ भी सोचने नहीं दे रहा है | यही इन पश्चिम आयातित पर्वों की इति है जो सुबह मेरी क्रिसमस से शुरू हुई थी |
कमोबेस इस तरह हमें आजादी का एहसास होता है और ये एहसास इस जवान मन को निश्चित ही एक थ्रिल देता है …..सीमाओं से उस पार जाकर ही शांत होने का थ्रिल !!! लेकिन जल्दी ही हम इन सब से उबने वाले हैं | जैसे हम नूडल्स और मोमो से उब गए …..अब तो उसकी महक से उबकाई आती है |
मित्रों, हमारा “गोलगप्पा” शाश्वत है….ठेले की टिकिया ही हमें ललचाएगी और आखिर में हम वहीँ आकर रुकेंगे | दीपावली के वो शांत, अकंप जलते “दीपक” ही भीतर तक रौशनी पंहुचा सकते हैं | इसका ध्यान रखना …..आज भले भूल गए हों की हम क्रिसमस और १ जनवरी क्यों मना रहे हैं | यह बस एक अन्धानुकरण है और हमें यह भी नहीं पता की हम किधर जा रहे हैं सिर्फ इस बात का संतोष है की हम बगल वाले से थोडा अलग हैं (आधुनिक नहीं) और आश्चर्य की बात की यह अलगाव हमें एक छद्म आधुनिकता का एहसास दे रहा है जैसे ट्रेन में बैठे एक बच्चे को लगे की बाहर के पेड़ कितनी तेजी से पीछे जा रहे हैं |
हम लोग जिस क्रिसमस और १ जनवरी को अपना दूसरा धर्म मान चुके हैं वो एक सड़ांध से कम नहीं है | कितना अज्ञान है हम लोगों में, दूसरों में गुण और अपनों में दोषदर्शन को ढूँढने का |
ईश्वर हिन्दुओं को गुलाम विचारों से निकालें |


Nice one
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